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पार्वा कार्यकारिणी के चुनाव - कार्यक्रम घोषित
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Saturday, October 22, 2011

दीवाली पर भी कूड़ा साफ़ नहीं होगा क्या?

 

 

 

 
प्रगति अपार्टमेन्ट्स के मुख्य द्वार के दाईं तरफ बहुत सारा कूड़ा पड़ा हुआ है. इस से अपार्टमेन्ट्स की छवि खराब हो रही है. मैंने कुछ दिन पहले पार्वा की आधिकारिक वेबसाईट पर एक पोस्ट लिखी थी पर उसका भी कोई असर नहीं हुआ. आप साथ की तस्वीरों पर क्लिक कीजिए और देखिये. तस्वीरें खुद बोलती हैं.

कौन हटाएगा यह कूड़ा? कल एक चोकीदार ने मुझे बताया कि यह कूड़ा पार्वा का है. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ. मैंने जब यह पूछा कि बाथटब और सिंक का पार्वा क्या कर रही है तब उसने कहा कि यह सब एक पार्वा कर्मचारी का है. किसी का भी हो इस कूड़े को तुरंत हटाया जाना चाहिए. पार्वा के सिक्योरिटी इंचार्ज क्या कर रहे हैं? क्या अपार्टमेन्ट्स के अंदर और आस-पास की सफाई की जिम्मेदारी उनकी नहीं है?  अगर उनकी नहीं है तब किस की है?

दीवाली आ रही है. अब तो यह कूड़ा हटा देना चाहिए. 

Sunday, July 17, 2011

Who represents this block?




Any guess?
NO!!!
Look again at the photos with care.
Still NO !!!
OK, I will tell you. Name of the block representative is Shri Soni. Surprised? Yes, you should be. Shri Soni was Election Officer in recently concluded election of PARWA EC. After the elections were over , Chadha Malik & Co rwarded him for the favour he gave to them in getting elected unopposed. Yes, yes, it is immoral, unethical and illegal, but who bothers?
Now, the passage as shown in the photos is very frequently used by residents of C-block. Pipe is broken and water flows in the passage. Lot of kachra/malba is lying there for long. A scooter with deflated tyre is parked for long. It is highly inconvenient for residents using the passage.
Shri Soni is not alone who is not bothered about this. PARWA vice-president and treasurer also live in C-block. Day before I saw them chatting just near the malba.
They seem to have selective vision.

Wednesday, December 29, 2010

कचरा संस्कृति

एक महिला परेशान खोई-खोई अपने बरामदे में टहल रही थी. दोपहर का वक़्त था. उनकी पडोसन भी अपने बरामदे में आईं. इन परेशान महिला को देखा तो बोलीं, 'क्या बात है बहन, बड़ी परेशान लग रही हो. सब ठीक तो है न?'
महिला, 'हाँ सब ठीक है, बस कुछ उलझन सी हो रही है'.
पडोसन, कैसी उलझन?'
महिला, 'ऐसा लग रहा है जैसे मैंने कुछ करना था पर किया नहीं और अब याद भी नहीं आ रहा कि क्या करना था.'
पडोसन, 'अरे तो इस में परेशान क्या होना. एक-एक करके गिन लो कि क्या करना था और क्या नहीं किया. सुबह उठने से शुरू करो.
'हाँ यह ठीक है', महिला ने खुश हो कर कहा और मन ही मन गिनना शुरू किया. कुछ ही देर में ख़ुशी से चिल्लाईं, 'याद आ गया. आज मैंने अभी तक पार्क में कचरा नहीं फेंका. बस इसी बात से उलझन हो रही थी.'
पडोसन, 'चलो ठीक हुआ, अब जल्दी से कचरा फेंको पार्क में और इस उलझन से छुटकारा पाओ'.'
महिला ने जोर से आवाज लगाईं, 'अरे बहू जल्दी दे प्लास्टिक में डाल कर कचरा दे, पार्क में फेंकना है.'
'पर सासूजी कचरा तो सारा जमादार ले गया.' बहू अन्दर से चिल्लाई.
'थोडा बचाकर नहीं रख सकती थी मेरे लिए? रोज पार्क में कचरा फेंकती हूँ जानती नहीं क्या?' महिला गुस्से से चिल्लाईं.
बहू बाहर आकर बोली, 'मैंने सोचा आपने फेंक दिया होगा. रोज सुबह आप सबसे पहला काम आप यही तो करती हैं.'
'अरे आज भूल गई', महिला बोली, 'अब जल्दी से कुछ कचरा तैयार करके ले आ. जब तक कचरा पार्क में नहीं फेंकूँगी मेरी उलझन दूर नहीं होगी'.
'अब इतनी जल्दी कचरा कहाँ से पैदा करूँ?, बहू ने कहा.
'हे भगवान्, किस गंवार को हमारे पल्ले बाँध दिया. जरा सा कचरा तक नहीं पैदा कर सकती.' महिला ने परेशानी में अपने माथे पर हाथ मारा.
बहू कुछ नहीं बोली और झल्लाती हुई अन्दर चली गई. मन में सोचा, बाबूजी को क्यों नहीं फेंक देती पार्क में, बेचारों का हर समय कचरा करती रहती है.
इधर महिला और परेशान हो गई. अचानक ही उन्हें एक आईडिया सूझा. उन्होंने अपनी पडोसन से कहा, 'बहन आपके यहाँ थोडा कचरा होगा? मुझे दे दीजिये कल लोटा दूँगी. मेरा आज का काम हो जाएगा.'
'हाँ हाँ बहन ले लीजिये कचरा और लौटाने की कोई जरूरत नहीं. आप अक्सर चाय, चीनी, दूध मांगती रहती हैं. कभी लौटाया है क्या कि अब कचरा लौटाएँगी'. पडोसन मुस्कुराते हुए बोली.
महिला तिलमिलाईं पर हंसते हुए बोली, 'अब जल्दी से मंगवा दो न कचरा.'
पडोसन ने अपनी बहू को आवाज दी, 'अरे बहू थोडा कचरा एक प्लास्टिक में डाल कर ले आ. आंटी को पार्क में फेंकना है.'
बहू कचरा ले कर आई और आंटी को दे दिया. महिला ने कचरे से भरा प्लास्टिक पार्क में फेंक दिया. दूर बैठा एक कुत्ता दौड़ा हुआ आया आया. प्लास्टिक को फाड़ा और कचरे को इधर उधर फैला दिया.
महिला के चेहरे पर प्रसन्नता और शान्ति का भाव था, ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कोई महान सामजिक और सांस्कृतिक कर्तव्य पूरा किया हो. वह हंसते हुए पड़ोसन से बोली, 'बहन आपका बहुत बहुत धन्यवाद. आपका यह उपकार जिंदगी भर नहीं भूलूंगी.'
पड़ोसन बोली, 'पड़ोसी होते किस लिए हैं?'
जय कचरा संस्कृति.

Monday, November 29, 2010

क्या सिर्फ गेट साफ़ होना काफी है?






प्रगति अपार्टमेंट्स का गेट तो साफ़ करवा लिया, पर उसकी दाईं तरफ का हिस्सा कौन साफ़ करवायेगा? किस की जिम्मेदारी है यह? देखिये कुछ तस्वीरें.

Thursday, April 22, 2010

इस हमाम में सब नंगे हैं

आज जब में पार्क से वापिस आ रहा था, मैंने यह देखा:

पढ़े-लिखे समझदार लोग रहते हैं प्रगति अपार्टमेंट्स में. अपने कर्तव्यों की जानकारी है उन्हें. जब जानकार लोग ऐसा अनुचित कार्य करते हैं तब उन्हें समझाना मुश्किल है, केवल दण्डित ही किया जा सकता है. पर दण्डित कौन किसे करेगा. इस हमाम में तो सब नंगे हैं.

 

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